अदि – अंधक का पुत्र | Spirituality in Hindi

हिन्दू पुराणों में असुरो और दैत्य के बारेमे बहोत अछेसे बर्णित किया गया हे। हिन्दू वेद पुराणों में आपको जीबन के कई गूढ़ रहश्य जानने को मिलेगा। Spirituality in Hindi के इस भाग मे जानेगे कैसे अपने दैत्य पिता के मृत्यु का बदला लेने के हेतु एक असुर भगवान शिव से भीड़ ने कैलाश चला जाता हे। और उसका अंजाम क्या होता हे। जानेगे आज के इस कथा में।

पुराणों में बताया गया हे के अदि दैत्य असुर राज अंधक का बेटा था। अपने पिता की भगवान शिव के हातो मृत्यु हो जाने पर वो बेहद ही दुखी अबस्था में चला गया। हर हाल में वो भगवान शिव से बदला लेना चाहता था। इस लिए उसने कड़ी तपस्या की।

कुछ दिन तक अथक तपस्या करने के बाद आखिर कर सामने भगवान ब्रम्हा साक्षात् प्रकट होते हे। ब्रम्हा जी को देख कर अदि बहोत खुस हुआ। ब्रम्हा जी ने उसे मन चाहा बरदान देने का वादा किया। इसका फायदा उठाते हुए अदि ने ब्रम्हा जी से अमर होने का बरदान मांग बैठा।

अदि की मूर्खता पर ब्रम्हा जी हस पड़े। फिर उन्होंने अदि से कहा के हर जीबित प्राणी जिसने इस धरा पर जन्म लिया हे उसकी मृत्यु निश्चित हे। इसीलिए अमर होने का बरदान वो उसे नहीं दे सकते। कोई और बरदान मांगने को कहा उन्होंने।

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पर अदि को तो सिर्फ अमरता ही चाहिए था। फिर उसने ब्रम्हा जी से कहा। अगर वो उसे संपूर्ण अमरत्वा नहीं दे सकते तो कमसे कम उसे ये बरदान दे के वो जब तक वो अपने असली दैत्य रूप में हो तब उसे कोई नहीं मार सकता। ब्रम्हा जी को भली भांति पता था के अदि उनके बरदान को ब्यर्थ कर रहा हे। फिर भी उन्होंने अदि को उसके मन चाहा फल प्रदान किया।

अदि अब कैलाश पर्बत पर चढ़ाई करने निकल पड़ा। लेकिन उसे ये भी भान था के अगर वो अपने दैत्य रूप में गया तो तुरंत ही पहचान लिया जायेगा। उसने पहले अन्दर जाने के लिए एक साप का रूप धारण किया। क्यों के उसे लगा के साप का रूप धारण करके वो आसानी से सिव जी के करीब जा पायेगा और उस पर किसी का संदेह भी नहीं जायेगा।

लेकिन जब वो कैलाश पर्बत में सिब जी के अस्थान के निकट पहंचा तो उसने देखा के माता पार्वती वहां नहीं थी। वो जंगल में तपश्या करने हेतु गयी हुई थी। इसका फ़ायदा उठाने के लिए अदि ने माता पार्वती का रूप धारण करके कैलाश पहंचा।

जैसे ही वो भगवान सिव के पास पहंचा सिव जी ने तुरंत ही उसे पहचान लिया और अपने त्रिसूल से उसका सर धड़ से अलग करदिया। ब्रम्हा जी के अनुसार दिए गए बरदान के अनुसार उसका बद्ध सिर्फ तभी सम्भब था जब अपने असली रूप में न हो तो भगवान शिव ने इसी चीज़ का फैयदा उठाते हुए असुर अदि का बद्ध कर दिया।

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